भारत तिवारी प्रकरण – कानून के राज में उठते गंभीर सवाल, मुठभेड़ या न्यायिक जांच का विषय?
बिहार। आरा जिले में भारत तिवारी की मृत्यु का मामला लगातार चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया, नागरिक संगठनों और विभिन्न वर्गों द्वारा इस घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है। यदि किसी व्यक्ति ने आत्मसमर्पण किया था अथवा वह पुलिस की हिरासत में था, तो उसकी मृत्यु को लेकर स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न खड़े होते हैं जिनका उत्तर केवल स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से ही प्राप्त हो सकता है। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है जहां संविधान प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। कानून का मूल सिद्धांत यह है कि किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अधिकार केवल न्यायालय को है। यदि किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप भी हों, तब भी उसे विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार न्याय पाने का अधिकार प्राप्त है।
देश में नक्सलवाद और उग्रवाद से जुड़े अनेक मामलों में सरकार द्वारा आत्मसमर्पण की नीति अपनाई गई है। ऐसे लोगों को मुख्यधारा में लौटने और सुधार का अवसर दिया जाता है। इसी संदर्भ में यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि यदि भरत तिवारी ने वास्तव में आत्मसमर्पण किया था, तो उनकी मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई और क्या सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था? घटना के बाद सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता पारदर्शी जांच की है। लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका कानून लागू करने की होती है, लेकिन पुलिस कार्रवाई भी न्यायिक समीक्षा और संवैधानिक मानकों के अधीन होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न निर्णयों में पुलिस मुठभेड़ों की स्वतंत्र जांच और जवाबदेही पर बल दिया है।
भारत तिवारी के परिजनों का कहना है कि उन्हें न्याय चाहिए। दूसरी ओर, पुलिस प्रशासन का भी अपना पक्ष हो सकता है, जिसे जांच प्रक्रिया के दौरान सामने आना चाहिए। इसलिए किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों, साक्ष्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक जांच और प्रत्यक्षदर्शी बयानों का निष्पक्ष परीक्षण आवश्यक है। इस मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि कानून के शासन वाले लोकतंत्र में मानवाधिकार, पुलिस जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया के सिद्धांत कितने महत्वपूर्ण हैं। यदि कहीं भी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए। वहीं यदि पुलिस कार्रवाई विधिसम्मत थी, तो सत्य भी सामने आना चाहिए। लोकतंत्र की शक्ति इसी में निहित है कि हर विवादित घटना की निष्पक्ष जांच हो, पीड़ित परिवार को न्याय मिले और जनता का कानून व्यवस्था पर विश्वास बना रहे।
.. कौशल विनोद पाठक

