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Friday, July 17, 2026

महाराष्ट्र में मरीजों के अधिकारों की रक्षा हेतु नए कानून की मांग तेज?

महाराष्ट्र में मरीजों के अधिकारों की रक्षा हेतु नए कानून की मांग तेज?
अस्पतालों की जवाबदेही, पारदर्शिता और समान उपचार व्यवस्था लागू करने की अपील ..
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को अधिवक्ता वी. एल. पाठक ने भेजा व्यापक मांग-पत्र

मुंबई, प्रतिनिधि। महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था में व्यापक सुधार और मरीजों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्रदान करने की मांग ने नया स्वरूप ले लिया है। उच्च न्यायालय के अधिवक्ता वी. एल. पाठक (विनोद कुमार लालजी पाठक) ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एक विस्तृत मांग-पत्र भेजकर राज्य में “मरीज अधिकार एवं अस्पताल जवाबदेही अधिनियम” लागू करने की मांग की है। मांग-पत्र में कहा गया है कि स्वास्थ्य सेवा केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा का सर्वोच्च दायित्व है। गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों और उनके परिजनों को आर्थिक, मानसिक एवं प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना नहीं करना चाहिए। प्रत्येक नागरिक को समान, सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराना सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों का नैतिक एवं संवैधानिक दायित्व है।

अधिवक्ता वी. एल. पाठक ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि राज्य के सभी सरकारी एवं निजी अस्पतालों में गंभीर मरीजों का तत्काल उपचार अनिवार्य किया जाए तथा केवल धन के अभाव में किसी भी मरीज को इलाज से वंचित न रखा जाए। उन्होंने यह भी मांग की है कि आर्थिक स्थिति, जाति, धर्म या सामाजिक वर्ग के आधार पर उपचार में किसी प्रकार का भेदभाव न हो तथा गरीब, मध्यम वर्ग और संपन्न नागरिकों को समान गुणवत्ता की चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। मांग-पत्र में अस्पतालों के लिए आपातकालीन चिकित्सा के न्यूनतम मानक निर्धारित करने, प्रत्येक मरीज के उपचार का संपूर्ण रिकॉर्ड एवं बिलिंग प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने तथा चिकित्सा लापरवाही सिद्ध होने पर कठोर दंड और पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा देने की व्यवस्था करने का भी सुझाव दिया गया है। अधिवक्ता पाठक ने राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र मरीज अधिकार संरक्षण प्राधिकरण गठित करने की मांग की है, जहां मरीज और उनके परिजन अपनी शिकायतों का त्वरित एवं निष्पक्ष समाधान प्राप्त कर सकें। साथ ही वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तथा गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों के लिए विशेष आपातकालीन चिकित्सा सहायता निधि स्थापित करने का भी प्रस्ताव रखा गया है। मांग-पत्र में यह भी सुझाव दिया गया है कि यदि किसी मरीज की मृत्यु होती है, तो उपचार प्रक्रिया, चिकित्सा अभिलेख और शुल्क निर्धारण की स्वतंत्र समीक्षा की व्यवस्था हो, ताकि यदि चिकित्सा लापरवाही या अनुचित बिलिंग सिद्ध हो तो पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके। साथ ही अनावश्यक जांच, महंगी दवाइयों और अत्यधिक बिलिंग पर प्रभावी नियंत्रण के लिए कठोर नियामक व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता भी बताई गई है।

अधिवक्ता वी. एल. पाठक ने स्पष्ट किया है कि इस पहल का उद्देश्य डॉक्टरों अथवा अस्पतालों के विरुद्ध वातावरण बनाना नहीं, बल्कि मरीजों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक पारदर्शी, जवाबदेह और न्यायसंगत स्वास्थ्य व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें ईमानदारी से सेवा करने वाले चिकित्सकों और अस्पतालों के हितों का भी समान संरक्षण हो। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसी व्यवस्था लागू होती है तो अस्पतालों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी, मरीजों का विश्वास मजबूत होगा और चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार आएगा। अब स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की निगाहें महाराष्ट्र सरकार पर हैं कि क्या मरीजों के अधिकारों की रक्षा और अस्पतालों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस कानूनी पहल की जाती है।

.. कौशल विनोद पाठक – विशेष संवाददाता

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