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Wednesday, June 24, 2026

1966 का महान मुंबई जल संकट : जब महानगर खाली कराने की नौबत आ गई थी ?

1966 का महान मुंबई जल संकट : जब महानगर खाली कराने की नौबत आ गई थी ?

मुंबई। आज जब मानसून की कुछ दिनों की देरी भी मुंबईकरों की चिंता बढ़ा देती है, तब यह जानना अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद है कि वर्ष 1966 में मुंबई ने अपने इतिहास के सबसे भीषण जल संकट का सामना किया था। स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि यदि मात्र दो दिन और वर्षा नहीं होती, तो सरकार को पूरे महानगर को खाली कराने जैसे अभूतपूर्व कदम पर विचार करना पड़ सकता था।

जलाशयों में बचा था केवल नाममात्र पानी
जुलाई 1966 के प्रथम सप्ताह तक मुंबई को पानी उपलब्ध कराने वाले प्रमुख जलाशयों के कैचमेंट क्षेत्रों में लगभग वर्षा नहीं हुई थी। परिणामस्वरूप जलाशयों का जलस्तर खतरनाक स्तर तक गिर गया।
तुलसी झील में मात्र 2 फुट पानी शेष था।
तानसा झील में केवल 5.5 फुट पानी बचा था।
वैतरणा जलाशय में मात्र 6 फुट पानी उपलब्ध था।

उस समय मुंबई की दैनिक जल आवश्यकता लगभग 1557 मिलियन लीटर थी, जबकि उपलब्ध जल आपूर्ति घटकर केवल 930 मिलियन लीटर रह गई थी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने 4 जुलाई 1966 को शहर में 50 प्रतिशत जल कटौती लागू कर दी।

मुख्यमंत्री की चेतावनी और शहर खाली कराने की तैयारी
जल संकट लगातार गहराता जा रहा था। 11 जुलाई 1966 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि यदि आगामी कुछ दिनों में वर्षा नहीं हुई तो मुंबईवासियों को स्वैच्छिक रूप से शहर छोड़ने की सलाह दी जा सकती है। सरकार ने संभावित आपदा से निपटने के लिए मुंबई के आंशिक अथवा पूर्ण विस्थापन की विस्तृत योजना भी तैयार कर ली थी। 15 जुलाई को इस संबंध में अंतिम निर्णय लिया जाना था। जल की बर्बादी रोकने के लिए राज्यपाल द्वारा विशेष अध्यादेश जारी कर कठोर दंडात्मक प्रावधान भी लागू किए गए थे।

उद्योग और जनजीवन पर पड़ा व्यापक प्रभाव
पानी की कमी ने मुंबई की अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन को लगभग ठहराव की स्थिति में ला दिया।
होटलों, लॉन्ड्रियों और धोबी घाटों को जलापूर्ति बंद कर दी गई।
अनेक कारखानों और औद्योगिक इकाइयों को कार्य दिवस कम करने के निर्देश दिए गए।
नागरिकों को सीमित पानी में दैनिक जीवन चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
मुंबई जैसे व्यस्त महानगर में यह स्थिति अभूतपूर्व थी।
जब विज्ञान के साथ आस्था भी बनी सहारा
संकट के दिनों में नागरिकों ने ईश्वर की शरण भी ली।

माटुंगा स्थित साउथ इंडियन भजन समाज ने लगातार चार दिनों तक “वरुण जाप” का आयोजन किया। वहीं शहर के विभिन्न चर्चों में विशेष प्रार्थना सभाएं और धार्मिक जुलूस निकाले गए। हर समुदाय एक ही प्रार्थना कर रहा था – हे प्रभु, वर्षा भेजो।

प्रकृति ने बचा ली मुंबई
जब 15 जुलाई की निर्णायक तिथि निकट आ रही थी, तभी प्रकृति ने करवट ली। 13 से 15 जुलाई 1966 के बीच मुंबई और उसके जलग्रहण क्षेत्रों में जोरदार वर्षा शुरू हो गई। अगले कुछ दिनों में बारिश इतनी तेज हुई कि सूख चुके जलाशय तेजी से भरने लगे। तीसरे सप्ताह तक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आ गया और सरकार ने शहर खाली कराने तथा औद्योगिक गतिविधियां रोकने की अपनी योजनाएं वापस ले लीं। मुंबई एक बड़े संकट से बाल-बाल बच गई।

आज के लिए सबक
लगभग छह दशक बाद भी वर्ष 1966 का जल संकट मुंबई के जल प्रबंधन इतिहास का सबसे बड़ा चेतावनी संकेत माना जाता है। वर्ष 2009 में भी शहर को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ा था, जब 30 प्रतिशत जल कटौती लागू करनी पड़ी थी। आज भी मुंबई का जीवन मानसून पर निर्भर है। वर्षा में थोड़ी सी भी देरी जलाशयों के घटते स्तर और जल संकट की आशंकाओं को जन्म दे देती है। ऐसे में 1966 की घटना हमें यह संदेश देती है कि जल संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। जल है तो कल है। 1966 का संकट हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के उपहार का सम्मान करना और हर बूंद पानी बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

कौशल विनोद पाठक, पत्रकार एवं सामाजिक विश्लेषक

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