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Saturday, August 8, 2026

सावन की कजरी “अरे रामा, घिरि आई कारी बदरिया”

सावन की कजरी
“अरे रामा, घिरि आई कारी बदरिया”

विनोद पाठक द्वारा स्वरचित विशेष कजरी
अरे रामा, घिरि आई कारी बदरिया,

भींजे मोरी चुनरिया ना…
सावन में झूला पड़े अमवा की डरिया,
घर नाहीं मोरे संवरिया ना…॥
रिमझिम-रिमझिम बरसे बदरिया,
चमके बिजुरी गगनवा।
पुरवा बहे तो जियरा डोले,
याद करे मोरा मनवा॥
अरे रामा, पपीहरा बोले पिहू-पिहू,
कोइलिया छेड़े तानवा ना…
सावन में याद आवे पिया की सुरतिया,
कैसे कटे दिन-रतिया ना…॥
अमवा की डारी झूला पड़ल बा,
सखियां गावें कजरिया।
हरी-हरी चूड़ी, हाथ में मेहंदी,
खनके पांव पयरिया॥
कोई झूले संग अपने साजन,
कोई हंसे मुसकाई।
हमरी अंखियां राह निहारे,
पिया अबहूं ना आई॥
अरे रामा, बरसे बदरिया सारी रतिया,
भींजे मोरा अंगनवा ना…
पिया बिना सूना लागे सावन,
सूना लागे भवनवा ना…॥
भदोही की माटी महक उठी है,
हरियर भइल सिवानवा।
धान के खेतवा लहर-लहर के,
गावें सावन गानवा॥
काशी के घाट पे गंगा मइया,
लहर-लहर मुसकाए।
घंटा-घड़ियाल की पावन धुनिया,
मन में आस जगाए॥
अरे रामा, गंगा किनारे सावन बरसे,
बाजे मंदिर घंटवा ना…
हर-हर महादेव गूंजे काशी,
महके सारा अंचरवा ना…॥
बाबुल के अंगना याद आवेला,
याद आवे माई।
नीम तर झूला, गांव की गलियां,
अंखियां भर-भर आई॥
माटी की खुशबू कहे पुकार के—
भूल न जइहऽ गांववा।
जहवां बचपन हंसत-खेलत बीतल,
उहे आपन ठांववा॥
अरे रामा, चाहे रहिहऽ दूर नगरिया,
मत भूलिहऽ आपन मटिया ना…
जननी-जन्मभूमि से बढ़िके,
नाहीं दूजी दुनिया ना…॥
सावन केवल बरखा नाहीं,
ई रिश्तन के त्योहार।
माई, बहिनी, सखी-सहेली,
सबके जोड़े प्यार॥
“विनोद” लिखें ई कजरी ऐसी,
माटी का सम्मान।
पूरब की पुरवइया संग-संग,
गूंजे हिंदुस्तान॥
अरे रामा, घिरि आई कारी बदरिया,
भींजे मोरी चुनरिया ना…
सावन में झूला पड़े अमवा की डरिया,
घर आ जा मोरे संवरिया ना…॥

रचनाकार : विनोद पाठक स्वरचित — सावन विशेष कजरी पूर्वांचल की लोक-संस्कृति एवं माटी को समर्पित

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