मीरा-भाईंदर में क्या चल रही है लूट-खसोट?
अपने ही विधायक पर भाजपा कार्यकर्ता के गंभीर आरोपों से गरमाई सियासत!
मीरा-भाईंदर। मीरा-भाईंदर की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने सत्ता, पुनर्विकास, प्रशासन और राजनीतिक प्रभाव के संबंधों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक भाजपा कार्यकर्ता/डेवलपर द्वारा भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता तथा उनके परिवार से जुड़े व्यक्ति पर पुनर्विकास परियोजना में कथित लाभ मांगने के आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की जांच की बात भी सामने आई है। मामला भाईंदर के नवघर क्षेत्र के ‘दामोदर टॉवर’ पुनर्विकास प्रकल्प से जुड़ा बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आरोप है कि इमारत को भोगवटा प्रमाणपत्र (Occupancy Certificate) दिलाने के संदर्भ में 10 प्रतिशत भागीदारी और एक कमरे की मांग की गई। विकासक ने कथित बातचीत की ध्वनिफीतियां पुलिस के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की बात कही है।
विधायक नरेंद्र मेहता का पक्ष भी सामने आया
इन आरोपों को विधायक नरेंद्र मेहता ने बेबुनियाद बताया है। उनके अनुसार, पुनर्विकास परियोजना में पुराने निवासियों को उनके घर मिलने तक भोगवटा प्रमाणपत्र नहीं दिया जाना चाहिए – इसी उद्देश्य से उन्होंने प्रशासन के समक्ष भूमिका रखी। उन्होंने आरोपों को बदनाम करने का प्रयास बताया है।
यानी फिलहाल तस्वीर दो अलग-अलग दावों की है – एक तरफ गंभीर आरोप और कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग, दूसरी तरफ आरोपी पक्ष का स्पष्ट खंडन। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के निष्कर्ष सामने आना आवश्यक है।
सबसे बड़ा सवाल: ‘सत्ता और पुनर्विकास’ का रिश्ता कितना पारदर्शी है? मीरा-भाईंदर जैसे तेजी से विकसित होते शहर में पुनर्विकास, बिल्डिंग अनुमति, OC, जमीन और नगररचना से जुड़े निर्णयों में बड़ी आर्थिक हिस्सेदारी होती है। इसलिए जनता का सवाल केवल किसी एक नेता या एक प्रकल्प तक सीमित नहीं होना चाहिए। क्या सभी पुनर्विकास परियोजनाओं में नियम समान रूप से लागू हो रहे हैं? क्या राजनीतिक पद और प्रशासनिक निर्णयों के बीच कोई अनुचित प्रभाव है? क्या शिकायतों की निष्पक्ष जांच होती है? और सबसे महत्वपूर्ण – क्या आम नागरिक तथा पुराने रहिवासियों के हित वास्तव में सुरक्षित हैं? इन सवालों के जवाब दस्तावेजी जांच और स्वतंत्र प्रशासनिक/कानूनी प्रक्रिया से ही मिल सकते हैं।
राजनीतिक लड़ाई या व्यवस्था का आईना?
मीरा-भाईंदर में भाजपा और शिवसेना के नेताओं के बीच राजनीतिक टकराव पहले से ही सार्वजनिक है। हाल के महीनों में जमीन, मतदाता सूची और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर भी दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं। ऐसे वातावरण में किसी भी नए आरोप को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके तथ्यात्मक रूप से जांचना जरूरी है। आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना – दो अलग बातें हैं। मीरा-भाईंदर की जनता को ‘लूट-खसोट’ के राजनीतिक नारों से अधिक जरूरत है- पारदर्शिता, दस्तावेजों की सार्वजनिक जांच और निष्पक्ष कार्रवाई की। यदि आरोप गलत हैं तो शिकायतकर्ता के आरोपों का तथ्यात्मक खंडन और जांच में स्पष्टता सामने आनी चाहिए। और यदि जांच में अनियमितता प्रमाणित होती है, तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं कि आरोप किसने लगाया – असली सवाल यह है कि आरोपों की निष्पक्ष जांच कौन करेगा और सच सामने कब आएगा?
.. कौशल विनोद पाठक

