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Wednesday, September 23, 2026

अदालत की दलीलें मीडिया की सुर्खियां नहीं? लंबित मामलों पर वकीलों की मीडिया चर्चा को लेकर जस्टिस अभय ओक की गंभीर चिंता..

अदालत की दलीलें मीडिया की सुर्खियां नहीं?
लंबित मामलों पर वकीलों की मीडिया चर्चा को लेकर जस्टिस अभय ओक की गंभीर चिंता..
BCI से कार्रवाई पर विचार करने का आह्वान, न्यायाधीशों के सवालों को अंतिम फैसला न मानने की सलाह

नई दिल्ली। न्यायपालिका, वकालत और मीडिया के बीच जिम्मेदारी तथा मर्यादा को लेकर पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओक ने एक महत्वपूर्ण बहस को सामने रखा है। हाल ही में आयोजित “Discourse on Ethics in Criminal Litigation, Trial by Media & Admissibility of Statements” कार्यक्रम में उन्होंने लंबित मामलों में वकीलों द्वारा अदालत में हुई कार्यवाही और अपनी दलीलों की सार्वजनिक चर्चा किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए। जस्टिस ओक ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में पेशेवर आचरण के नियमों की जांच और, उपयुक्त परिस्थितियों में, कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से BCI Rule 5, जो अधिवक्ताओं द्वारा विज्ञापन और काम मांगने पर प्रतिबंध से संबंधित है, की ओर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यदि कोई अधिवक्ता लंबित मामले में मीडिया इंटरव्यू देकर अपनी दलीलों, अदालत की कार्यवाही या अपनी भूमिका को प्रचारित करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार यह नियम प्रासंगिक हो सकता है।

“वकील का पहला दायित्व अदालत के प्रति”
जस्टिस ओक ने रेखांकित किया कि अधिवक्ता का मूल कर्तव्य अपने मुवक्किल के पक्ष को पूरी क्षमता से न्यायालय के सामने रखना और “Officer of the Court” के रूप में न्यायालय की सहायता करना है। उनका सवाल था कि संवेदनशील सुनवाई समाप्त होने के तुरंत बाद अदालत में हुई बहस और न्यायाधीशों द्वारा पूछे गए सवालों को मीडिया के सामने विस्तार से रखने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ती है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि कुछ मामलों में वकील अदालत में पूछे गए सवालों को अपने पक्ष में न्यायालय की संभावित राय के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इससे आम जनता के बीच मामले के परिणाम को लेकर समय से पहले धारणा बन सकती है।

न्यायाधीश का सवाल फैसला नहीं होता
जस्टिस ओक की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा न्यायाधीशों द्वारा सुनवाई के दौरान पूछे जाने वाले सवालों से जुड़ा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत में किसी न्यायाधीश द्वारा पूछा गया सवाल अथवा व्यक्त की गई prima facie view को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। न्यायाधीश किसी दलील को समझने, किसी कानूनी पहलू की जांच करने या अधिवक्ता को किसी विशेष मुद्दे पर स्पष्टीकरण देने के लिए सवाल कर सकते हैं। सुनवाई के दौरान सामने आया प्रारंभिक विचार अंतिम निर्णय में उसी रूप में कायम रहे, यह आवश्यक नहीं है।

Open Justice और Live Streaming के समर्थक
जस्टिस ओक ने अदालतों की कार्यवाही को जनता और मीडिया के लिए खुला रखने के सिद्धांत का समर्थन किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग के विचार का भी समर्थन किया, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ सकती है। हालांकि उनका जोर इस बात पर रहा कि लाइव-स्ट्रीमिंग या लाइव रिपोर्टिंग के दौरान न्यायाधीशों के सवालों और मौखिक टिप्पणियों को अंतिम निर्णय की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। इससे न्यायिक प्रक्रिया की वास्तविक प्रकृति को समझने में जनता को भ्रम हो सकता है।

मीडिया पर Gag Order समाधान नहीं
मीडिया रिपोर्टिंग को नियंत्रित करने के लिए Gag Orders को जस्टिस ओक ने समाधान नहीं माना। उनके विचार में न्यायालयों की कार्यवाही खुली होनी चाहिए और न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना के लिए भी स्थान होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अदालत की अवमानना करता है तो कानून के तहत कार्रवाई का अलग प्रावधान मौजूद है; लेकिन यह मीडिया को किसी खबर को प्रकाशित करने से रोकने या खबर को किसी विशेष तरीके से प्रकाशित करने का निर्देश देने से अलग विषय है।

पुलिस, राजनेताओं और सरकारी वकीलों को भी संयम की जरूरत
जस्टिस ओक ने केवल अधिवक्ताओं की भूमिका पर ही सवाल नहीं उठाया, बल्कि लंबित आपराधिक मामलों में पुलिस अधिकारियों, राजनेताओं और सरकारी वकीलों द्वारा मीडिया में दिए जाने वाले बयानों को लेकर भी चिंता व्यक्त की। जांच के दौरान गवाहों के बयान, आरोपियों की पहचान, जांच की दिशा या अन्य संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक किए जाने से जांच प्रभावित होने की आशंका हो सकती है। उन्होंने विशेष रूप से पुलिस द्वारा हिरासत में कथित कबूलनामे के संबंध में मीडिया को दिए जाने वाले बयानों पर भी सावधानी बरतने की बात कही। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने और सजा निर्धारित करने का अधिकार न्यायालय का है, न कि मीडिया बहस अथवा राजनीतिक बयानबाजी का।

“Media Trial” से आगे-सभी पक्षों की जिम्मेदारी
जस्टिस ओक के विचारों का व्यापक संदेश यह है कि न्यायिक प्रक्रिया केवल अदालत और वकीलों तक सीमित नहीं है। पुलिस, अभियोजन, राजनीतिक प्रतिनिधि, अधिवक्ता और मीडिया-सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। मीडिया द्वारा न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष और सटीक रिपोर्टिंग लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा Open Justice के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन लंबित मामलों में सार्वजनिक बयानों के जरिए ऐसी धारणा बनना कि किसी आरोपी का दोष पहले ही तय हो चुका है या न्यायालय ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया है, न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को प्रभावित कर सकता है। जस्टिस अभय ओक की टिप्पणी वर्तमान दौर में न्यायपालिका और मीडिया के बदलते संबंधों पर गंभीर विचार का अवसर देती है। अदालत में बहस का स्थान अदालत है, फैसला न्यायालय का है और जनता तक सूचना पहुंचाने में तथ्यात्मकता तथा संयम सभी पक्षों की साझा जिम्मेदारी है। न्यायिक पारदर्शिता और मीडिया की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण तत्व हैं, लेकिन इनके साथ पेशेवर नैतिकता और जिम्मेदार सार्वजनिक संवाद भी उतना ही आवश्यक है। जस्टिस ओक की टिप्पणी इसी संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
.. कौशल विनोद पाठक – विशेष संवाददाता

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