पितृ पक्ष में बाबूजी और माई को नमन ..
संस्कारों की छांव आज भी जीवन का मार्गदर्शन करती है!
संस्कार। पितृ पक्ष का यह पावन अवसर केवल अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करने का समय नहीं, बल्कि उन जीवन-मूल्यों को फिर से हृदय में उतारने का अवसर है, जो हमें हमारे माता-पिता से विरासत में मिले हैं। आज बाबूजी और माई की स्मृतियों के सामने आंखें नम हैं, हृदय भावुक है और मन अतीत की उन अनगिनत यादों में खो गया है, जिनमें उनका स्नेह, त्याग, अनुशासन और संस्कार आज भी जीवंत हैं। बाबूजी और माई हमारे लिए केवल माता-पिता नहीं थे, वे हमारे जीवन के प्रथम शिक्षक, मार्गदर्शक और संस्कारों की पाठशाला थे। उन्होंने हमें सिखाया कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य, ईमानदारी, मेहनत और आत्मसम्मान का रास्ता कभी नहीं छोड़ना चाहिए। माई की ममता में जहां वात्सल्य और करुणा की असीम धारा थी, वहीं बाबूजी के व्यक्तित्व में अनुशासन, जिम्मेदारी और दृढ़ता का अद्भुत संगम था। उनके स्नेह की छांव में हमने जीवन को समझना सीखा और उनके व्यवहार से यह जाना कि परिवार की वास्तविक शक्ति प्रेम, एकता और परस्पर सम्मान में होती है। आज वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनकी बातें, उनकी सीख और उनके संस्कार हर कदम पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। जब कभी जीवन में कोई कठिन निर्णय सामने आता है, तो ऐसा लगता है जैसे बाबूजी की आवाज भीतर से कह रही हो – सही रास्ते पर चलो, चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो। और माई की ममता जैसे यह विश्वास दिलाती है कि परिवार को प्रेम और एकता के सूत्र में बांधे रखना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
पितृ पक्ष हमें यह भी याद दिलाता है कि पूर्वज केवल स्मृतियों में नहीं रहते। वे हमारी सोच, हमारे व्यवहार, हमारी परंपराओं और हमारे संस्कारों में जीवित रहते हैं। हमारे अच्छे कर्म ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हैं। आज इस पावन अवसर पर बाबूजी और माई के चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए हम संकल्प लेते हैं कि उन्होंने हमें जो संस्कार दिए हैं, उनका पालन करने के लिए सदैव कटिबद्ध रहेंगे। परिवार में प्रेम, बड़ों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, जरूरतमंदों की सहायता और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का प्रयास करते रहेंगे। आंखों में आंसू हैं, लेकिन इन आंसुओं के पीछे गर्व भी है—ऐसे माता-पिता का संतान होना, जिन्होंने हमें जीवन की सबसे अनमोल संपत्ति धन नहीं, बल्कि संस्कार दिए।
बाबूजी और माई ..
आप दोनों जहां भी हैं, हमारा सादर प्रणाम स्वीकार करें। आपकी स्मृतियां हमारे लिए अमूल्य धरोहर हैं और आपके संस्कार हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी। पितृ पक्ष के इस पावन अवसर पर आप दोनों को कोटि-कोटि नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि। “मां की ममता, पिता का आशीष, जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। देह भले ही दूर हो जाए, संस्कारों में उनकी मौजूदगी है।”
.. विनोद पाठक

