पौराणिक धरोहरों को सहेजकर विकास की नई कहानी – यमुना-चंबल के संगम पर बसी ऐतिहासिक धरती..

इटावा। उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक जनपद इटावा आज अपनी पौराणिक धरोहरों को सहेजते हुए आधुनिक विकास की एक नई परिभाषा गढ़ रहा है। यमुना और चंबल नदी के पावन संगम पर बसा यह शहर, जिसे महाभारत काल में ‘एक चक्र नगरी’ के नाम से जाना जाता था, आज सिर्फ अपनी ऐतिहासिक गाथाओं तक सीमित नहीं है। बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं और इको-टूरिज्म के क्षेत्र में हो रहे बड़े बदलावों के जरिए यह जिला उत्तर प्रदेश के विकास मानचित्र पर एक नई पहचान बना रहा है। इटावा का इतिहास अत्यंत समृद्ध है, जो महान साहित्यकार गोपालदास नीरज जैसी विभूतियों और राजा सुमेर सिंह के ऐतिहासिक किले को अपने भीतर समेटे हुए है। सदियों पुराना यह किला आज भी अपनी वास्तुकला और प्राचीन गाथाओं के लिए जाना जाता है, जिसके गुप्त रास्ते सीधे यमुना नदी तक जाते हैं। इसके साथ ही, यहाँ महाभारत कालीन और लगभग 5,000 साल पुराना ऐतिहासिक काली मंदिर भी मौजूद है, जहाँ मान्यता है कि अश्वत्थामा आज भी पूजा करते हैं। इसके अतिरिक्त, प्राचीन नीलकंठ महादेव मंदिर का सौंदर्यीकरण कर इसे एक भव्य रूप दिया जा रहा है, जो जिले की आध्यात्मिक चेतना को और मजबूत करता है।
शहर के बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी में आया बदलाव यहाँ के विकास की गति को साफ दर्शाता है। पहले शहर के भीतर लगने वाले घंटों के लंबे जाम से मुक्ति दिलाने के लिए लगभग 73 करोड़ की लागत से बसरेहार बाईपास का निर्माण किया गया है, जिसने यातायात को बेहद सुगम बना दिया है। इसके साथ ही, लगभग 5,500 करोड़ की भारी-भरकम लागत से बने 104 किलोमीटर लंबे और 8-लेन के किसान पथ (आउटर रिंग रोड) ने इटावा को बाराबंकी, कानपुर और हरदोई जैसे पड़ोसी जिलों से सीधे जोड़ दिया है, जिससे स्थानीय किसानों और व्यापारियों को मंडियों तक अपनी पहुंच आसान बनाने में बड़ी मदद मिल रही है।

