दबदबे के लिए इस्तेमाल हथियार – DM को हाईकोर्ट का ये निर्देश?
प्रयागराज, आत्मरक्षा के नाम पर खुलेआम बंदूकें रखना, डराने-धमकाने का एक साधन बन जाता है, जो असल में सुरक्षा के बजाय डर को बढ़ावा देता है। जिस समाज में हथियारबंद लोग अपना दबदबा दिखाते हैं और धमकियों के जरिए अपना प्रभाव जमाते हैं, वह समाज ज्यादा आजाद या शांतिपूर्ण नहीं बनता बल्कि इससे लोगों का भरोसा कम होता है, सुरक्षा की भावना कमजोर होती है और नागरिक शांति भंग होती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को यह बात कही। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को हथियारों के लाइसेंस देने की अपनी नीति पर फिर से विचार करे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि, पहली नजर में हथियार ऐसे औजार हैं जिनका इस्तेमाल ताकत दिखाने और सुरक्षा का भ्रम पैदा करने के लिए किया जाता है, जो अक्सर सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ता है और समाज के लोगों में डर और असुरक्षा पैदा करता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि आत्मरक्षा का असली मकसद जान बचाना और व्यवस्था बनाए रखना है, न कि दबदबे और डर का माहौल बनाना। ऐसी संस्कृति जो बंदूकों के प्रदर्शन और डराने-धमकाने को बढ़ावा देती है, उसे एक शांतिपूर्ण और कानून मानने वाले समाज के लिए सही नहीं माना जा सकता। इससे पहले एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर ने राज्य के सभी 75 जिलों के जिलाधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे लाइसेंस देते समय या उनका नवीनीकरण करते समय हथियार अधिनियम और उससे जुड़े नियमों का सख्ती से पालन करें। साथ ही उन्होंने यह भी सलाह दी थी कि आपराधिक इतिहास वाले लोगों को लाइसेंस देने की नीति पर फिर से विचार किया जाए।

