दूध में मिलावट : चिंता वास्तविक, लेकिन वायरल दावों में कितना सच?
“87% भारतीयों को कैंसर” वाली WHO चेतावनी निकली गलत : फिर भी मिलावट पर सख्ती जरूरी ..
नई दिल्ली। भारत में दूध और दुग्ध उत्पादों में मिलावट का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। सोशल मीडिया पर वायरल संदेशों में दावा किया जा रहा है कि देश में बिकने वाला 68.7 प्रतिशत दूध मिलावटी है और यदि मिलावट नहीं रुकी तो 87 प्रतिशत भारतीयों को कैंसर हो सकता है। लेकिन उपलब्ध सरकारी तथ्यों की पड़ताल करने पर तस्वीर इससे अलग दिखाई देती है। भारत सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने स्पष्ट किया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत सरकार को ऐसी कोई चेतावनी जारी नहीं की, जिसमें कहा गया हो कि दूध में मिलावट के कारण 87 प्रतिशत भारतीय कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो जाएंगे। WHO के भारत कार्यालय ने भी FSSAI को ऐसी किसी एडवाइजरी से इनकार किया था। इसलिए वायरल तस्वीर में दिया गया यह दावा भ्रामक है।
FSSAI के सर्वेक्षण में क्या मिला?
FSSAI के National Milk Safety and Quality Survey 2018 में देशभर के 1,103 शहरों/कस्बों से 6,432 दूध के नमूने लिए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार बड़े पैमाने पर दूध में खतरनाक मिलावट होने की धारणा को आंकड़ों का समर्थन नहीं मिला। हालांकि गुणवत्ता में कमी, संदूषण तथा कुछ नमूनों में असुरक्षित तत्व पाए गए, इसलिए निगरानी की आवश्यकता बनी हुई है इसका अर्थ यह नहीं कि दूध में मिलावट की समस्या समाप्त हो गई है। 2026 में भी अलग-अलग राज्यों से मिलावटी दूध पकड़े जाने की घटनाएं सामने आई हैं। हाल ही में राजकोट में अधिकारियों ने करीब 5,400 लीटर मिलावटी दूध नष्ट किया। FSSAI ने दूध विक्रेताओं को नियामकीय दायरे में लाने और मिलावट रोकने के लिए अभियान भी तेज किया है।
अफवाह नहीं, जागरूकता और कार्रवाई जरूरी
दूध बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक करोड़ों भारतीयों के दैनिक आहार का हिस्सा है। इसलिए मिलावट का एक मामला भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। सरकार और FSSAI को नियमित नमूना जांच, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और जांच परिणामों में पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए। वहीं उपभोक्ताओं को भी बिना सत्यापन के “WHO की चेतावनी” जैसे भय पैदा करने वाले संदेश आगे भेजने से बचना चाहिए।
निष्कर्ष साफ है – दूध में मिलावट एक वास्तविक खाद्य-सुरक्षा चुनौती है, लेकिन “87% भारतीयों को कैंसर होगा” जैसी सनसनीखेज चेतावनी WHO की नहीं है। स्वास्थ्य सुरक्षा की लड़ाई अफवाहों से नहीं, वैज्ञानिक जांच, सतर्कता और कठोर कानून-पालन से जीती जाएगी।
.. कौशल विनोद पाठक – विशेष संवाददाता / विशेष रिपोर्ट

