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Wednesday, July 15, 2026

वर्तमान राजनीति का अभिशाप : कार्यकर्ता सिर्फ कार्यकर्ता ही रह जाता है ..

वर्तमान राजनीति का अभिशाप : कार्यकर्ता सिर्फ कार्यकर्ता ही रह जाता है ..

मुंबई। लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी राजनीतिक दलों का कार्यकर्ता होता है। चुनावी मौसम में वही पार्टी का चेहरा बनकर गांव-गांव, गली-गली और घर-घर तक पहुंचता है। पोस्टर लगाने से लेकर जनसभाओं की व्यवस्था, सोशल मीडिया प्रचार, बूथ प्रबंधन और मतदाताओं से सीधा संवाद—हर जिम्मेदारी वह पूरी निष्ठा के साथ निभाता है। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही कार्यकर्ता अक्सर हाशिये पर दिखाई देता है। भारतीय राजनीति का यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर लंबे समय से चर्चा होती रही है कि क्या राजनीतिक दल अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को उनकी मेहनत और निष्ठा के अनुरूप सम्मान और अवसर दे पा रहे हैं? कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन की वास्तविक शक्ति कार्यकर्ताओं में निहित होती है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित रह जाती है।

सत्ता बदलती है, लेकिन कार्यकर्ता की स्थिति नहीं
चुनाव में जीत के बाद सरकार बनती है, मंत्रिमंडल का गठन होता है, विभिन्न निगमों, बोर्डों और समितियों में नियुक्तियां होती हैं। ऐसे अवसरों पर अक्सर चर्चा होती है कि लंबे समय से संगठन में सक्रिय कार्यकर्ताओं की तुलना में प्रभावशाली, आर्थिक रूप से सक्षम या हाल ही में जुड़े लोगों को अधिक महत्व मिल जाता है। यह धारणा कई दलों के संदर्भ में समय-समय पर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही है।

निष्ठा बनाम अवसर
राजनीति में वर्षों तक संघर्ष करने वाले अनेक कार्यकर्ता उम्मीद करते हैं कि उनके अनुभव, संगठनात्मक योगदान और जनता के बीच उनकी सक्रियता को उचित पहचान मिलेगी। यदि उन्हें लगातार अवसर नहीं मिलते, तो इससे उनके मनोबल पर प्रभाव पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे संगठन की दीर्घकालिक मजबूती भी प्रभावित हो सकती है।

लोकतंत्र की मजबूती का आधार
लोकतंत्र केवल नेताओं के भाषणों से नहीं चलता, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं की मेहनत से चलता है जो बिना किसी बड़े पद के समाज और संगठन के बीच निरंतर सक्रिय रहते हैं। यदि संगठन में पारदर्शिता, योग्यता और समर्पण को समान रूप से महत्व दिया जाए, तो इससे राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता और जनता का विश्वास दोनों मजबूत हो सकते हैं।

आगे की राह
राजनीतिक दलों के सामने चुनौती यह है कि वे संगठन के हर स्तर पर कार्यकर्ताओं के योगदान का निष्पक्ष मूल्यांकन करें, संवाद की संस्कृति विकसित करें और योग्य कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने के समान अवसर दें। इससे न केवल संगठन मजबूत होगा, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था भी अधिक उत्तरदायी और जन-केंद्रित बन सकेगी।

निष्कर्ष
कार्यकर्ता किसी भी राजनीतिक दल की नींव होता है। यदि नींव मजबूत होगी, तभी लोकतंत्र की इमारत भी मजबूत रहेगी। समर्पित कार्यकर्ताओं के सम्मान, भागीदारी और उचित अवसर सुनिश्चित करना केवल संगठनात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा की भी महत्वपूर्ण शर्त है।

.. कौशल विनोद पाठक 

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