IBC : वसूली तंत्र से जवाबदेही के ढांचे तक – कॉर्पोरेट सलाहकार अंकुर शर्मा

मुंबई। भारत की बैंकिंग व्यवस्था और कॉर्पोरेट क्षेत्र में वर्ष 2016 में लागू दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) ने एक क्रांतिकारी बदलाव लाया। यह कानून केवल बैंकों की वसूली का माध्यम नहीं, बल्कि वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही स्थापित करने का महत्वपूर्ण उपकरण बन चुका है। इसी विषय पर कॉर्पोरेट सलाहकार अंकुर शर्मा से कौशल विनोद पाठक ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस विशेष साक्षात्कार के प्रमुख अंश ..
प्रश्न 1 : क्या IBC वास्तव में बैंकों की वसूली में मददगार साबित हुआ है?
अंकुर शर्मा: निश्चित रूप से IBC ने बैंकिंग क्षेत्र में बड़ा बदलाव किया है। पहले बैंकों को ऋण वसूली के लिए वर्षों तक DRT, SARFAESI और सिविल न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। IBC ने समयबद्ध प्रक्रिया देकर ऋणदाताओं का विश्वास बढ़ाया है। हालांकि सभी मामलों में वसूली की दर समान नहीं रही। कई बड़े मामलों में बैंकों ने अरबों रुपये की वसूली की, जबकि कुछ मामलों में भारी “हेयरकट” भी स्वीकार करने पड़े। सबसे बड़ी सफलता यह है कि IBC ने उधारकर्ताओं को यह संदेश दिया कि ऋण चुकाना उनकी जिम्मेदारी है और डिफॉल्ट के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
प्रश्न 2 : क्या रिजोल्यूशन प्रोफेशनल्स (RP) और NCLT ने अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभाई है?
अंकुर शर्मा: कुल मिलाकर उनकी भूमिका सकारात्मक रही है।
प्रमुख उपलब्धियां :
संकटग्रस्त कंपनियों के मूल्य को संरक्षित करना।
CIRP प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना।
सफल समाधान योजनाओं को लागू कराना।
NCLT और CoC को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना।
चुनौतियां :
कई मामलों में प्रक्रिया में अत्यधिक देरी।
धोखाधड़ी वाले लेन-देन की पर्याप्त जांच का अभाव।
कुछ क्षेत्रों में तकनीकी विशेषज्ञता की कमी।
कुछ हितधारकों द्वारा पक्षपात के आरोप।
सुधार की आवश्यकता :
IBBI द्वारा अधिक सख्त निगरानी।
RP की जवाबदेही बढ़ाना।
क्षेत्र विशेष विशेषज्ञों की नियुक्ति।
पेशेवर कदाचार पर कड़ी कार्रवाई।
प्रश्न 3 : ऋण नहीं चुकाने वाले प्रमोटरों के खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए?
अंकुर शर्मा: सभी डिफॉल्टरों को एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। कानून को ईमानदार व्यापारिक असफलता और जानबूझकर किए गए वित्तीय दुराचार में अंतर करना चाहिए।
यदि व्यापारिक विफलता वास्तविक हो:
IBC के तहत समाधान प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।
व्यक्तिगत गारंटी लागू की जा सकती है।
भविष्य के व्यवसायिक अवसरों पर स्थायी रोक नहीं होनी चाहिए।
यदि जानबूझकर डिफॉल्ट किया गया हो:
आपराधिक कार्रवाई।
व्यक्तिगत संपत्तियों की कुर्की।
निदेशक पद पर प्रतिबंध।
भविष्य में ऋण प्राप्त करने पर रोक।
PMLA, Companies Act और अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई।
प्रश्न 4 : बैंकों द्वारा प्रमोटरों की व्यक्तिगत गारंटी लागू करना कितना प्रभावी है?
अंकुर शर्मा: यह एक महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन इसे पूर्ण समाधान नहीं कहा जा सकता।
फायदे :
कंपनी की परिसंपत्तियों के अतिरिक्त वसूली का एक और स्रोत।
प्रमोटरों की जवाबदेही बढ़ती है।
ऋण अनुशासन मजबूत होता है।
सीमाएं :
कई प्रमोटर पहले ही संपत्तियां हस्तांतरित कर चुके होते हैं।
लंबी कानूनी लड़ाइयां प्रक्रिया को धीमा कर देती हैं।
कई मामलों में व्यक्तिगत संपत्ति बकाया ऋण से कम होती है।
इसलिए व्यक्तिगत गारंटी के साथ फोरेंसिक ऑडिट और संपत्ति ट्रैकिंग भी आवश्यक है।
प्रश्न 5 : यदि कोई प्रमोटर बैक-डोर एंट्री से कंपनी पर दोबारा नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयास करे तो क्या होना चाहिए?
अंकुर शर्मा: IBC का उद्देश्य संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का पुनर्जीवन है, न कि डिफॉल्टरों को पुनः नियंत्रण दिलाना।
आवश्यक कदम :
समाधान आवेदकों की गहन जांच।
वास्तविक लाभकारी स्वामित्व (Ultimate Beneficial Ownership) का खुलासा।
स्वतंत्र फोरेंसिक जांच।
गलत जानकारी के आधार पर स्वीकृत योजना को रद्द करना।
स्वामित्व छिपाने पर दंडात्मक कार्रवाई।
ऐसे मामलों में मध्यस्थों और सहयोगियों की भी जवाबदेही तय करना।
प्रश्न 6 : IBC की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?
अंकुर शर्मा: IBC की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल वसूली नहीं है, बल्कि क्रेडिट कल्चर में बदलाव है। आज कंपनियां और प्रमोटर ऋण चुकाने को लेकर पहले से अधिक सतर्क हैं। पहले डिफॉल्ट को सामान्य व्यापारिक जोखिम माना जाता था, लेकिन अब जवाबदेही बढ़ी है।
प्रश्न 7 : आने वाले समय में IBC को और प्रभावी बनाने के लिए क्या सुधार आवश्यक हैं?
अंकुर शर्मा: आगे का रास्ता स्पष्ट है-
प्रमुख सुधार : समाधान प्रक्रिया की समय सीमा का सख्ती से पालन।
रिजोल्यूशन प्रोफेशनल्स की जवाबदेही बढ़ाना।
धोखाधड़ी करने वाले प्रमोटरों पर त्वरित कार्रवाई।
व्यक्तिगत गारंटी का प्रभावी क्रियान्वयन।
बैक-डोर एंट्री पर पूर्ण रोक।
समाधान योजनाओं में पारदर्शिता।
सार्वजनिक धन और बैंकिंग पूंजी की बेहतर सुरक्षा।
विशेष टिप्पणी
अंकुर शर्मा का मानना है कि IBC को केवल “रिकवरी लॉ” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारत की वित्तीय प्रणाली में जवाबदेही, पारदर्शिता और जिम्मेदार उधारी को बढ़ावा देने वाला व्यापक ढांचा है।
उन्होंने कहा कि “IBC की वास्तविक सफलता केवल वसूली प्रतिशत से नहीं, बल्कि जिम्मेदार उधारी को बढ़ावा देने, व्यवहार्य व्यवसायों को बचाने और जनता के धन की रक्षा करने की क्षमता से मापी जाएगी।”
निष्कर्ष
आठ वर्षों की यात्रा में IBC ने भारत के दिवाला समाधान तंत्र को नई दिशा दी है। चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन यह कानून बैंकिंग क्षेत्र में अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करने की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हुआ है। आने वाले वर्षों में आवश्यक सुधारों के साथ IBC भारत की आर्थिक और वित्तीय संरचना को और अधिक मजबूत बना सकता है।
… विशेष संवाददाता – कौशल विनोद पाठक मुंबई

