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Saturday, May 30, 2026

हिंदी पत्रकारिता दिवस – क्या हाशिए पर चली गई है राष्ट्रभाषा?

हिंदी पत्रकारिता दिवस – क्या हाशिए पर चली गई है राष्ट्रभाषा?

     मुंबई, 30 मई का दिन भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इसी दिन वर्ष 1826 में पंडित युगल किशोर शुक्ल ने हिंदी के प्रथम समाचार पत्र “उदन्त मार्तण्ड” का प्रकाशन प्रारंभ किया था। इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। आज जब हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मना रहे हैं, तब एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा है – क्या राष्ट्रभाषा हिंदी हाशिए पर चली गई है? भारत विश्व का सबसे बड़ा हिंदी भाषी देश है। करोड़ों लोग हिंदी बोलते, समझते और लिखते हैं। इसके बावजूद प्रशासन, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा, कॉर्पोरेट जगत और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अंग्रेजी का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। हिंदी का प्रयोग अक्सर औपचारिक आयोजनों और भाषणों तक सीमित होकर रह जाता है। डिजिटल युग में हिंदी पत्रकारिता ने अभूतपूर्व विस्तार पाया है। समाचार पोर्टल, यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया और ऑनलाइन समाचार मंचों ने हिंदी को नई पहचान दी है। किंतु दूसरी ओर भाषा की शुद्धता, संवेदनशीलता और साहित्यिक गरिमा पर संकट भी गहराया है। टीआरपी और क्लिकबेट की दौड़ में हिंदी पत्रकारिता का एक वर्ग अपनी मूल जिम्मेदारियों से भटकता दिखाई देता है।

    हिंदी पत्रकारिता का मूल उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करना, लोकतंत्र को मजबूत बनाना और जनसरोकारों को आवाज देना है। आज आवश्यकता है कि हिंदी पत्रकारिता अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेकर सत्य, निष्पक्षता और जनहित की भावना को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।

    राष्ट्रभाषा हिंदी को हाशिए पर जाने से रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं, बल्कि समाज, शिक्षण संस्थानों, मीडिया संगठनों और प्रत्येक नागरिक की है। जब तक हम अपनी भाषा पर गर्व नहीं करेंगे, तब तक हिंदी को उसका वास्तविक सम्मान नहीं मिल सकेगा। हिंदी पत्रकारिता दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य और हिंदी पत्रकारिता के विकास में अपना सक्रिय योगदान देंगे। क्योंकि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह हमारी संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्रीय पहचान की आत्मा होती है। हिंदी जीवित है, हिंदी प्रासंगिक है और हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है – बशर्ते हम उसे सम्मान और व्यवहार में स्थान दें।

विशेष लेखक : कौशल विनोद पाठक  

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