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Tuesday, July 14, 2026

भारत की अमर चेतना – स्वामी विवेकानंद

भारत की अमर चेतना – स्वामी विवेकानंद

: स्वरचित काव्यांजलि :
सदियों की तपती धरती पर, जब आशा का अंकुर सूख गया,
मानव के अंतर का उजियारा, स्वार्थ के तम में डूब गया।
तब भारत की पुण्य धरा से, एक दिव्य पुकार प्रकट हुई,
ज्ञान, तपस्या और सेवा की, अमृतमयी फुहार प्रकट हुई।
वह तेज नहीं था केवल, वह तो युग की नई मशाल बना,
हर सोई हुई आत्मा के भीतर, जागृत आत्मविश्वास बना।
उसने मानव को मानव होना, जीवन का सच्चा अर्थ बताया,
सेवा, त्याग और प्रेम के पथ पर, चलने का पावन मंत्र सुनाया।
उसकी वाणी में वेदों का स्वर, उसकी दृष्टि में हिम का धैर्य,
उसके संकल्पों में गंगा-सी पावनता, कर्मों में अडिग शौर्य।
उसने कहा – डर कर जीना, मानव का सम्मान नहीं,
अपने भीतर छिपी दिव्यता को पहचानो, इससे बड़ा वरदान नहीं।
जिस राष्ट्र का युवा जागृत हो, वह राष्ट्र कभी झुकता नहीं,
जिसके चरित्र में सत्य बसता हो, उसका सूरज रुकता नहीं।
न्याय, परिश्रम और सदाचार, जीवन की सच्ची पूँजी हैं,
इनसे ही इतिहास बनते हैं, इनसे ही ऊँची दूजी नहीं।
आओ फिर से दीप जलाएँ, शिक्षा का उत्सव घर-घर हो,
ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति से, भारत का उज्ज्वल भविष्य हो।
भूखा कोई सोए न धरती पर, अश्रु किसी के व्यर्थ न हों,
मानवता के पावन मंदिर में, भेदभाव के अर्थ न हों।
हे अमर संन्यासी! तेरी वाणी, हर युग का उद्घोष बने,
हर भारतवासी के जीवन में, कर्तव्य का आलोक बने।
तेरी प्रेरणा से राष्ट्र खिले, विश्व में फिर सम्मान बढ़े,
भारत केवल शक्तिशाली ही नहीं, करुणामय भी महान बने।
तेरे चरणों में यह प्रण अर्पित—
न झूठ का साथ निभाएँगे,
न अन्याय के आगे झुकेंगे,
सत्य का दीप जलाएँगे।
जब तक गंगा की लहरों में भारत का इतिहास बहेगा,
जब तक हिमालय अटल खड़ा है, तेरा यश अमर रहेगा।
हर पीढ़ी तुझसे प्रेरित होकर, नव निर्माण का गीत लिखेगी,
विवेक, साहस और सेवा से, मानवता की जीत लिखेगी।
कोटि – कोटि नमन उस महापुरुष को,
जिसने भारत का मान बढ़ाया।
अपने जीवन के हर क्षण से,
मानवता का दीप जलाया।

.. स्वरचित : विनोद पाठक © सर्वाधिकार सुरक्षित 

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